Writing

 

What is writing ?
An art, passion , or just a medium to convey your message.

In my opinion writing is the combination of art and passion which make some sense and make the way easier for conveying the message.

Writing is something that comes up with the core of the heart. Each and every written word is your own feelings that comes up with you. Anyone can become a writer as the topics for the write-ups are those only which has happened to someone someday. All you need is the courage to pick up a paper and pen, and pen down all your feelings and situation with few words. Trust me if you have true feelings then the reader will connect himself/herself to your write-up.

Writing – A way through which one can express everything what’s going inside them, what’s their perspective regarding something and much more. Writing is the easiest way to overcome yourself with what’s going inside you. Just pen down everything using beautiful words.

Writing –  A way to communicate to the world. You can have your sayings in front of the world if you have the beautiful set of words with you. Just carve your emotions then world will talk to you.  Your point of view may be supported or criticised according to what you have written.

You can write about anything but if you are writing it with your experience then no one can be a better writer than you, because those will be your true outcomes with the situation. It’s all yours.

There is lot more to talk about writing which can’t be explained. It can be experienced only.
कवियों की जुबान कलम है,

पत्रकारों की शान कलम है ,

जैसे घुमाओ वैसे घूमे,

खुद की कही बड़ी नादान कलम है ।। ”

“Believe a writer in you and you can bring the revolution with your words. ”

 

 

 

 

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ख्वाबों की दुनिया

“सोच से परे है एक जहां ,

पर ना जाने वो है कहाँ,

जीने की ख्वाहिश में वो जहां ढूंढते है,

ख्वाबों की दुनिया शायद इसी को कहते है ।।
है हम ही राजा और हम ही है रंक यहाँ के,

ये दुनिया है बिल्कुल परे इस जहां के ।।

हा ये दुनिया है हमारे ख्वाबों की दुनिया, हमारे अपने ख्वाबों की दुनिया जिसके सिकन्दर हम खुद  है । 

इस दुनिया के रचयिता भी हम है और इस दुनिया के ध्वंशक भी हम ।।

ये  एक ऐसी दुनिया है जिसे हम हर रोज नए रंगों से सजाते है, 

दुनिया के जो रंग भी हमे नही पसंद वो इस दुनिया के भीतर कोई पनाह नही पाते है ।।

इस दुनिया मे हम अपने दुश्मनों को भी दोस्त बनाके चलते है तो इस दुनिया मे कही न कही हम भगवान से भी मिलते है।।


जिसकी जो सोच है वो उसी हिसाब से कहता है 

स्वपन हर कोई देखता है पर कोई कोई ही उसे बयान करता है।।

ये दुनिया इस दुनिया से काफी अलग है , यहां हर कोई साथी है ,

कहने को है बात हँसी की पर हर कोई यहां चींटी समक्ष हाथी है ।।
किरदार दिखे जो पर्दे पर वो किरदार भी  यहाँ जी जाते है,

सच कहु तो नींद से परे किरदार पर्दे पर ही रह जाते है।।
घुट पिये जो विष के जग में ,

नींद में अमृत बन जाते है,

दुनिया से परे होकर,

हम और कही जग जाते है।।

हर पल यहाँ बिताये शायद ही याद रह पाते है,

जो याद रह गए वो पल कभी कभी नींद उड़ाते है ।।

सपने वही जो सोने ना दे , नींद के आड़ में उसे खोने ना दे ,

ख्वाबों की हो बनावट ऐसी , जो हकीकत में यकीन होने ना दे ।।

ख्वाबों का पीछा करके न जाने कितने आबाद हो गए,

जो ख्वाबों में ही रह गए वो शायद कही बर्बाद हो गए।।

ये ख्वाब की दुनिया है सबसे हसीन ,

कही सफेद तो कही रंगीन ।।

सोच समझ तू कदम बढ़ा ,

हर मोड़ यहां षडयंत्र गढ़ा ।।

सिर्फ ख्वाब में रह के फस जाओगे …

ख्वाबों में जाके बाहर आ गए .. यकीन मानो सफलता जरूर पाओगे ।। “

समाज के दो स्तम्भ

​समाज के दो स्तम्भ है। जहां एक तरफ महिला है तो दूसरी तरफ पुरुष है। इन दोनो के मेलजोल से ही समाज बेहतर तरीके से नजर आता है।हम अक्सर देखते है कि समाज मे महिलाओ को वो स्थान दिया जाता है जो कि पुरुष से काफ़ी आगे हैं।

मैं मानता हूं  महिलाओं को वो स्थान मिलना चाहिए लेकिन आप ही बताओ अगर एक ही स्तम्भ को ज्यादा मजबूत करेंगे तो क्या इमारत गिर नही जाएगी।

पुरुष भी समाज मे वही अहमियत रखते है जो की महिलायें रखती है फिर कही न कही जो भेदभाव है हमारे समाज मे क्या वो सही है हमारे समाज के लिए ??

नही।।

माना एक वक्त था जब महिलाओ पे अत्याचार होते थे और कही न कही आज भी हो रहे है लेकिन गौर फरमाने वाली बात ये है कि वो अत्याचार भी तो महिलाएं ही करती थी ।

वक़्त तो बदल चुका है ।

आज के दौर में बीच चौराहे अगर कोई महिला पुरुष को थप्पड़ जड़ दे तो भी जनता बिना कुछ पूछे पुरुष पे ही हाथ उठती है और अगर कोई पुरुष महिला पे हाथ उठा दे तो भी मर्द ही पिटता है चाहे गलती किसी की भी हो ।

आज के दौर में अक्सर ये देखा गया है कि अगर कोई महिला किसी पुरुष पे उंगली उठा रही है तो पूरी समाज बिना कुछ कहे कहे सुने पुरुष को ही कुसूरवार ठहराने लगती हैं । क्या कभी सोचा है कि क्या वाकई पुरुष गलत था ?

आयेदिन हमे सुनने को मिलता है महिलाओं के साथ ये हुआ महिलाओं के साथ वो हुआ क्या कभी किसी ने ये दिखाया कि समाज मे पुरुषो के साथ क्या हो रहा ।

अगर ध्यान दी जाए तो कही न कही महिलाओं को सशक्त बनाने की होड़ में हम पुरुषों को कुछ ज्यादा ही गलत ठहराने लगे है।

आख़िर पुरुष भी इसी समाज का हिस्सा है क्या कभी किसी ने उससे पूछा कि उन्हें क्या चाहिए ? महिलाओं की तो हर आवाज़ को उठाने के लिए न जाने कितने संगठन है और ना जाने कितने संस्थान है लेकिन आप ही बताये क्या ऎसी कोई संस्थान है जो कि पुरुषों की आवाज़ को उठाये ।

मेरा मानना है कि पुरुष गलत होते है लेकिन गौर फरमाने वाली बात ये है कि “क्या सारे पुरूष गलत है ?”

अगर इस सवाल का जवाब “ना” है तो क्या हर पुरुष को एक ही नजरिये से देखने की इस रिवाज को बदलना चाहिए या नही ?

आजकल एक महिला अगर काम कर रही है और पुरुष घर संभाल रहे है तो पुरुषो को निठल्ला ठहरा देती है समाज लेकिन क्या उसी समाज ने कभी इस बात पे गौर किया है कि वो पुरुष भी घर को उसी तौर तरीके से संभाल रहे है जिस तौर तरीके से महिला संभालती ।

अब जरा आप ही बताइए कि अगर पुरुष काम करे और महिलायें घर संभाले तो ये सही है तो अगर महिलाये कमाए तो इसमें हर्ज ही क्या है ?? एक तरफ तो हम महिलाओं को मजबूत बनाने की होड़ में लगे है और अगर जो कोई पुरुष इस बात पर अमल करता है उन्हें आगे रखता है उसे समाज “निठल्ला” क्यों ठहरा देती है ? अगर महिलाये पुरुष की तरह सारे काम कर सकती है तो अगर पुरुष भी उचित तरीके से घर का काम संभाल रहे है तो उन्हें क्या ऐसा कहना गलत नही ??

एक बड़ी ही पुरानी कहावत है कि “गेहूं के साथ घुन भी पिस्ता है ” बिल्कुल सही कही गयी है ।

लेकिन जब समाज की बात आती है तो ये कहावत सिर्फ मर्दो पे ही क्यों लागू होती है?

अगर कोई पुरुष गलती करता है तो सिर्फ  उस पुरुष पर उंगली उठाने के बजाए बड़ी आसानी से लोग कह देते है कि सारे मर्द एक जैसे होते है लेकिन अगर किसी महिला ने समाज मे कोई गलती की है उस वक़्त सिर्फ वही महिला गलत होती है बाकी महिलाओ पे तो कोई उंगली नही उठाता, आखिर ऐसा क्यों होता है ??

क्या वाकई सारे पुरुष गलत है ??

अगर नही तो फिर पुरुषों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों ?

क्या वो इस समाज का हिस्सा नहीं ??

अगर किसी महिला पे गलत इल्जाम लग जाये तो हर कोई सवालिया निशान खरे कर देता है लेकिन अगर किसी पुरूष पे गलत इल्जाम लग जाये तो फिर ये निशान गायब कहा हो जाते हैं ??  कोई बात नही आगे से ऐसा नही होना चाहिए ऐसा कह के लोग टाल देते है क्यों क्या पुरुष न्याय के हकदार नही है ? क्या उन्हें न्याय नहीं मिलना चाहिए ।

इन सभी बातों से जो चोट पुरुषों को लगती है वो अंदरूनी है और वो कहते है ना कि अंदरुनी चोट दिखते नही पर दुखते बहुत है ।।

पुरुष शुरू से काफी मजबूत हिस्सा है समाज का मैं मानता हूं और महिलाओं को आगे लाने चाहिए वो भी हमारे समाज का हिस्सा है लेकिन एक करवी सच्चाई ये भी है कि महिलाओं को आगे लाते लाते हमने पुरुषों को काफी तकलीफ दिए हैं ।

लोग कहते है कि बेटियां पराया धन होती है पर उन बेटो का क्या जो अपना घर संभालने को अपना ही घर त्याग देते है और सारी सुख सुविधाओं से वंचित होके उस जगह ऐसी जिंदगी जीते है जिसकी कोई कामना नही कर सकता।

अगर कुछ लोग समाज मे सही नही है तो हर किसी को गलत ठहराया जाना ये कहा का न्याय है ।।

कही न कही आज के इस दौर में हमने समाज के दूसरे स्तम्भ को काफी खोखला कर दिया है ।

आज के इस दौर में महिलाएं पुरुष के साथ कदम से कदम मिला के आगे बढ़ रही है ये काफी अच्छी बात है इससे हमारे समाज को ही फायदा है लेकिन जब बात आती है महिला और पुरुष पे तो फिर अहमियत सिर्फ महिलाओ को ही क्यों ?

अगर  महिलाए ही  गलत नही है तो “सारे मर्द एक जैसे है” ये कहना कहा का न्याय है ।

जिस तरह पुरुष गलत होते है तो कही न कही महिलाये भी गलत है । वो कहते है ना ” ताली एक हाथ से कभी नही बजती ” ।

अगर हम महिलाओ को आगे ला रहे है और पुरुषों से तुलना हो रही है तो फिर दोनों के साथ समाज का दो रवैया क्यों ..??

तब समाज की ये बाते कहा खो जाती है कि “पुरुष और महिला में कोई भेदभाव नहीं ” ।

अगर पुरुष वैज्ञानिक है तो महिलाए भी बन सकती है तो अगर महिलाए घर संभालती है तो पुरुष भी घर संभाल सकते है इसमें कही से कोई गलती नही ।।

महिलाओ को तवज्जो दी गयी है जिसका कुछ लोग गलत फायदा उठाते है ये तो हमे कोई नही दिखाता !!

हर बार बस मर्द गलत हो जाते हैं बात खत्म ।।

हमे अपने समाज के इस विडम्बना को बदलना होगा कि मर्दो को तकलीफ नही होती ।।

अरे होती है भाई बस मर्द खामोश हो जाते है और सबसे बड़ी बात है कि उनकी आवाज बस खामोश ही नही होती वो दब जाती हैं उन्हें फिर कोई नही उठाता क्योंकि ऐसा कोई संगठन कोई समुदाय नही जो पुरुषो की आवाज़ को उठाये ।

अगर समाज रूपी इमारत को बचाना है तो दूसरे स्तम्भ को भी मजबूत बनाये रखना होगा जितना कि एक को बना रहे है ।।

समानता की बाते अगर कर रहे है तो समानता समाज मे रखनी भी होगी तभी समाज बेहतर बनेगा ..।।

वरना स्तम्भ अगर खोखला हुआ तो इमारात कभी भी गिर सकती हैं।।

बहुत सी बातें है कहने को पर शब्दो में हर बात कह पाना मुमकिन नही ये बाते बस महसूस की जा सकती है ।

“” सोच बदलो समाज बदल जायेगा ।।

समाज बदलो देश बदल जायेगा ।। “”